नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को अदालती कार्यवाही के दौरान 'नैतिक आचरण' बनाए रखने की कड़ी नसीहत दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वकील केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा और 'ऑफिसर ऑफ द कोर्ट' हैं।
बहस छोड़ना भी एक 'प्रोफेशनल कला' है
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वकीलों से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे अपनी वाकपटुता या बहस के कौशल को प्रदर्शित करने के लिए स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ जाकर 'खेल के नियम' तोड़ें।
अदालत ने महत्वपूर्ण बात कहते हुए रेखांकित किया:
"जब कानून का कोई मुद्दा पहले से ही तय (Settled) हो चुका हो, तो वहां बहस को छोड़ देना भी एक प्रोफेशनल कला है। वकीलों को ऐसे सबमिशन देकर कोर्ट का कीमती समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, जो पहले से मौजूद मिसालों के विपरीत हों।"
क्या था मामला?
यह मामला साल 2011 में दिल्ली के मोती नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई क्रॉस-FIR से जुड़ा है।
- विवाद: मामला धारा 323 और 341 (IPC) के तहत दर्ज था। चार्जशीट दाखिल करने में एक साल से अधिक की देरी हुई थी।
- हाईकोर्ट का फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में CrPC की धारा 468 (लिमिटेशन) का हवाला देते हुए कार्यवाही रद्द कर दी थी।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के इस फैसले को पलट दिया और कहा कि लिमिटेशन कानून का यहां गलत इस्तेमाल किया गया था।
वकीलों के लिए कोर्ट का संदेश:
- मिसालों का सम्मान: एक बार जब संविधान पीठ किसी कानूनी मुद्दे को सुलझा देती है, तो वकीलों को उस मिसाल (Precedent) का सम्मान करना चाहिए।
- सन्तुलन जरूरी: वकीलों को अपने मुवक्किल के प्रति वफादारी और अदालत के प्रति अपनी ड्यूटी के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
- न्यायिक अनुशासन: कोर्ट ने जोर दिया कि न्याय प्रणाली केवल जजों पर नहीं, बल्कि वकीलों के जिम्मेदार आचरण पर भी निर्भर करती है।
अदालत की सीख: बेवजह की लंबी और बेबुनियाद दलीलों से न केवल कोर्ट का वक्त जाया होता है, बल्कि न्याय मिलने में भी देरी होती है।

